सुषमा जी का एक कदम
जब सुषमा जी से पूछा गया — ‘आप क्या करती हैं?सुषमा जी साठ साल की हो चुकी थीं।
उनका घर अच्छा था। पति थे, बच्चे थे, बहू थी, पोते-पोतियाँ थे। घर में किसी चीज़ की कमी नहीं थी। सुबह से शाम तक उनका समय कभी रसोई में, कभी घर के काम में और कभी बच्चों की चिंता में निकल जाता था।
उन्हें अपने परिवार से बहुत प्यार था।
इतना प्यार कि धीरे-धीरे उनका परिवार ही उनकी पूरी दुनिया बन गया था।
एक दिन सुषमा जी अपनी बहू के साथ बाज़ार गईं। वहीं उनकी मुलाकात उनकी बचपन की सहेली राधा से हो गई।
सुषमा जी बहुत खुश हुईं।
“अरे राधा! देखो, ये मेरी बहू है। और ये राधा है, मेरी बचपन की सहेली। हमने साथ में पढ़ाई की थी।”
फिर सुषमा जी हँसते हुए अपनी बहू से बोलीं, “तुम्हें पता है, राधा ने अपने परिवार के खिलाफ जाकर अपना छोटा-सा कारोबार शुरू किया था। उस समय सबने मना किया था इसे।”
राधा मुस्कुराई।
“हाँ, छोटा ही था। लेकिन इतने सालों में वही छोटा-सा कारोबार अब काफी बड़ा हो गया है।”
सुषमा जी ने गर्व से कहा, “अच्छा! बहुत बढ़िया किया तुमने।”
कुछ देर दोनों पुरानी बातें करती रहीं। फिर राधा ने सहजता से पूछा,
“और तुम सुषमा? तुम क्या कर रही हो आजकल?”
सुषमा जी कुछ समझ नहीं पाईं।
“मतलब?”
राधा ने हँसते हुए कहा, “अरे, तुमने मुझे अपने पति के बारे में बताया, बच्चों के बारे में बताया, बेटे के बारे में बताया, बहू के बारे में बताया... सबके बारे में बताया। लेकिन तुम क्या कर रही हो?”
सुषमा जी कुछ पल चुप रहीं।
फिर मुस्कुराकर बोलीं,
“मेरी कमाई तो मेरी औलाद है।”
राधा ने भी मुस्कुरा दिया।
बात वहीं खत्म हो गई।
लेकिन सुषमा जी के मन में नहीं हुई।
उस रात वह देर तक जागती रहीं।
उन्हें पहली बार लगा कि राधा ने कोई गलत बात नहीं पूछी थी।
उन्होंने अपने जीवन में बहुत कुछ किया था। घर संभाला था। बच्चों को बड़ा किया था। परिवार के लिए जाने कितनी चीज़ें छोड़ी थीं।
लेकिन जब किसी ने उनसे पूछा—
“आप क्या कर रही हैं?”
तो उनके पास अपने बारे में कहने के लिए कुछ नहीं था।
अगले कुछ दिनों तक वह इस बात को भूलने की कोशिश करती रहीं।
लेकिन सवाल बार-बार लौट आता।
“मैं क्या कर रही हूँ?”
एक शाम उनके बेटे ने उन्हें चुप बैठे देखा।
“माँ, क्या हुआ?”
सुषमा जी ने पहली बार उससे कहा,
“मैं अपने लिए कुछ करना चाहती हूँ।”
बेटा थोड़ा चौंका।
“तो कीजिए ना।”
“इस उम्र में?”
बहू हँसते हुए बोली, “माँ, उम्र किसने रोक रखी है?”
परिवार ने मिलकर सोचा कि सुषमा जी कोई नई चीज़ सीखें। ऐसी चीज़ जिसमें शायद उन्हें शुरुआत में ज्यादा रुचि भी न हो, लेकिन जिसमें उनका मन लगे और वह कुछ नया सीख सकें।
उन्होंने सिलाई सीखने का फैसला किया।
पहले दिन सुई पकड़ना भी उन्हें भारी लग रहा था। धागा बार-बार उलझ जाता था। कपड़ा टेढ़ा हो जाता था।
दूसरे दिन उन्होंने कहा, “मुझसे नहीं होगा।”
लेकिन परिवार ने उन्हें हिम्मत दी।
धीरे-धीरे उनकी उंगलियाँ चलने लगीं। टांके सीधे होने लगे। उन्होंने वीडियो देखे, पुरानी किताबें पढ़ीं और अभ्यास करती रहीं।
कुछ महीनों बाद उन्होंने घर में ही छोटे-छोटे कपड़े सिलने शुरू कर दिए।
उसी समय राधा की कहानी भी उनके मन में बार-बार आती थी।
राधा, जिसे उसके परिवार ने 18 साल की उम्र में शादी के लिए दबाव डाला था, जैसे सुषमा जी की हुई थी। लेकिन राधा ने साफ मना कर दिया था।
उसने बहुत गुस्सा झेला, ताने सुने, आवाज़ उठाई, और अकेले ही अपने रास्ते पर चल पड़ी।
उसने एक छोटा-सा अचार का काम शुरू किया था। लोग हँसते थे, मज़ाक उड़ाते थे, लेकिन उसने हार नहीं मानी।
आज वही छोटा काम बड़ा बन चुका था।
सुषमा जी को समझ आने लगा कि हर किसी की ज़िंदगी सिर्फ परिवार के इर्द-गिर्द नहीं घूमनी चाहिए।
कुछ दिन बाद सुषमा जी ने अपने बनाए हुए कपड़े पड़ोस की महिलाओं को दिखाए। उन्हें बहुत पसंद आए।
एक महिला ने कहा, “सुषमा जी, आप तो बहुत अच्छा सिलती हैं। हमें भी सिखाइए।”
सुषमा जी मुस्कुराईं।
उन्हें पहली बार लगा कि उनके पास भी कुछ अपना है।
अब उनका परिवार उनकी पूरी दुनिया नहीं था, बल्कि उनकी दुनिया का एक हिस्सा था।
उन्होंने सोचा—
“मैंने अपने बच्चों के लिए बहुत जी लिया। अब थोड़ा अपने लिए भी जीना चाहिए।”
सुषमा जी ने उस दिन कोई बड़ा फैसला नहीं लिया था।
उन्होंने बस एक छोटा-सा कदम उठाया था।
लेकिन वही छोटा कदम उनके जीवन में बड़ा बदलाव बन गया।
अब उनके पास सिर्फ यादें नहीं थीं, बल्कि एक पहचान भी थी।
और सबसे बड़ी बात—
अब जब कोई उनसे पूछता,
“आप क्या कर रही हैं?”
तो उनके पास मुस्कुराकर जवाब होता था।
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